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Showing posts with the label धर्म

बुद्ध और अशोक की भेंट। अशोक के पूर्वजन्म की कहानी। रोमांच। meeting between Buddha and Ashoka | Theromanch

बुद्ध और अशोक की भेंट   ये कथा है प्राचीन बौद्ध ग्रंथ अशोकवदन की जिसमें अशोक के जीवन से जुड़ी कई घटनाओं का वर्णन किया गया है। यह बात तब की है जब अशोक का जन्म नहीं हुआ था , जब भगवान बुद्ध इस संसार मे थे और अपने ज्ञान से संसार को सींच रहे थे। एक दिन वे राजगृह के एक बाजार मे पहुंचे और अपने शिष्यों के साथ भिक्षा स्वीकार करने लगे। उनको आया देख लोग उनकी तरफ दौड़-दौड़ कर जाने लगे। कोई उनको भिक्षा देता तो कोई उनके सामने नतमस्तक हो आशीर्वाद मांगता। लोगों के अंदर भगवान बुद्ध के लिए अपार श्रद्धा थी। वे सभी उनकी कृपा पाना चाहते थे। बुद्ध सभी को प्रसन्नता से आशीर्वाद दे रहे थे। उस भीड़ से कुछ दूरी पर दो बालक मिट्टी मे खेल रहे थे। उन बालकों के नाम थे जय और विजय। जब उन दोनों ने भीड़ को देखा तो उनमे से जो जय था उसने विजय से पूछा , “विजय! यह कौन है जिसके लिए इतनी भीड़ लगी हुई है?” विजय ने अपनी समझदारी दिखाते हुए कहा , “अरे तुम्हें नहीं मालुम ? ये महात्मा बुद्ध हैं जिनके आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए लोगों की भीड़ लगी है।” जय की जिज्ञासा शांत हुई किंतु उसकी अब उसकी अभिलाषा जाग्रत हुई। “यदि ...

महत्व । हर एक कार्य का। कौन सा कार्य महत्वपूर्ण है? which action/ profession should I do? Karma Philosophy | The Romanch

महत्व । हर एक कार्य का   वनपर्व (महाभारत) मे महर्षि मार्कण्डेय द्वारा युधिष्ठिर को सुनाई गई एक कथा जिसमें वो कर्म के महत्व पर चर्चा करते हैं। एक बार एक मुनि थे ‘ कौशिक ’ । वे परमज्ञानी , महान मुनि थे जिन्हें अपने तप का अपार अहंकार था। एक बार जब वे एक वृक्ष के नीचे ध्यान मे मग्न थे , तभी एक चिड़िया ने उनके ऊपर बीट कर दी। महामुनि का ध्यान भंग हो गया। वे क्रोध से तमतमा उठे। उनकी लाल आंखो ने जैसे ही चिड़िया को देखा , वैसे ही चिड़िया नीचे जमीन पर गिर गई और तड़पने लगी। तड़प-तड़प कर चिड़िया कुछ ही देर मे मर गई। महर्षि के साथ किए अपराध का दंड उसे प्राण देकर चुकाना पड़ा। चिड़िया के मरने पर कौशिक का क्रोध शांत हुआ। उसके जले हुए शरीर को देखकर उनके हृदय मे दया का भाव आया। पीड़ा हुई। वे अपने कार्य पर बहुत पछताए किंतु अब पछताने से क्या हो सकता था। उनका ध्यान भंग हो चुका था। वे दोबारा नहीं बैठे और कुछ भिक्षा के लिए चल दिए। कई द्वारों पर भिक्षा मांगकर वे एक स्त्री के द्वार पर पहुंचे और आवाज लगाई। “भिक्षा दो माई!” अंदर से स्त्री ने जबाब दिया “हां अभी आई बाबा। प्रतीक्षा करो।” कौशिक काफी देर तक प्रत...

नवरात्रि । सकारात्मकता के नौ दिन। देवी के नौ रूपों मे प्रकृति की महत्ता । रोमांच । navaratri | nine days of positivity | imporance of nature in nine forms of Devi | Romanch | The Romanch

नवरात्रि  एक कथा सुनाई जाती है कि एक बार ऋषि-मुनियों की एक सभा आयोजित की गई जिसमें सभी ऋषि-मुनियों ने ज्ञान आदि के लिए भगवान शिव और देवी पार्वती को निमंत्रित किया। शिव और शिवा दोनों वहां पधारे और उनको देखकर सभी ने उनका स्वागत किया। सभा प्रारम्भ होती इससे पहले ऋषियों के समूह ने देवाधिदेव और आदिशक्ति की अराधना व परिक्रमा करने की इच्छा की जिसे हमारे माता-पिता ने मुस्कुराकर स्वीकार किया। उसी सभा मे भृंगी ऋषि भी थे। भृंगी ऋषि के अंदर नारी शक्ति के प्रति तुच्छ भाव थे और उनके अनुसार नारी का महत्व पुरुष के समक्ष अधिक नहीं होता था जिसके कारण वे आदिशक्ति माता पार्वती को भी बस महादेव की पत्नी के आधार पर ही सम्मान देते थे किंतु आदिमाता के रूप मे उनके अंदर कोई विशेष भाव नहीं था। जिस समय सभी ऋषियों ने महादेव और माता पार्वती की परिक्रमा की , उसी समय भृंगी ऋषि ने केवल महादेव की परिक्रमा की और देवी को छोड़ दिया। ऐसे समय देवी ने अपनी लीला की। उन्होनें भृंगी ऋषि को सम्बोधित करके कहा कि आपको नारी शक्ति अर्थात प्रकृति की कोई आवश्यकता नहीं है इसीलिए आपके शरीर से मै प्रकृति के गुणों को ले लेती हूं तब...

व्याध की कथा (शिवरात्रि कथा) | रोमांच की दुनिया। पौराणिक कथा। धार्मिक कथा। Romanch Ki Duniya | Mythology |

व्याध की कथा बहुत समय पहले एक भील व्याध(शिकारी) था जिसका नाम था गुरुद्रूह। वह अपने माता-पिता तथा पत्नी के साथ रहता था। जीवन भर वह शिकार करता रहा, बहुत से पाप भी कर गया किंतु कभी सत्कर्म नहीं किया। एक समय जब शिवरात्रि का दिन था, उसके घर मे खाने के लिए कुछ भी नहीं था। यद्यपि उसके घर में किसी को भी यह ज्ञात नहीं था कि आज शिवरात्रि है किंतु फिर भी सभी का व्रत हो गया। भूख से व्याकुल व्याध के परिवार के लोगों ने उससे कुछ लाने को कहा और व्याध किसी जानवर की तलाश मे जंगल की तरफ गया। बहुत समय तक घूमने के बाद भी उसे कुछ भी ऐसा न मिला जिसके द्वारा उसके परिवार की भूख मिटाई जा सके। वह लौटना चाहता था किंतु उसके मन मे यही डर आ रहा था कि उसका परिवार उसी की राह देख रहा होगा। सभी को उसका इंतजार होगा कि वह आए तो भोजन आए।  सोचते-सोचते वह एक तालाब के किनारे पहुंच गया। वहां उसके मन मे यह विचार आया कि रात्रि के समय जरूर कोई ना कोई जीव वहां जल के लिए आयेगा और तब वह उसे मारकर घर ले जाएगा। वैसे भी दिनभर घूमते-घूमते वह थक चुका था और अब रात होने ही वाली थी। अब व्याध को बस इंतजार करना था। पास ही बेल का एक पेड़ था...

भगवान परशुराम की कथा| रोमांच की दुनिया। पौराणिक कथा। हिंदू धर्म। (Story of Bhagwan Parashuram)। Romanch Ki Duniya | Mythology | Hindu Dharma

भगवान परशुराम की कथा महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु नाम की एक गाय थी जो सभी वैभवों से युक्त सभी इच्छाएं पूर्ण करती थी। उस समय हैहयवंश मे कृतवीर्य का पुत्र कार्तवीर्य अर्जुन सिंहासन पर आरुढ़ था। उसने दत्तात्रेय जी से वरदान मे सहस्त्रहाथ प्राप्त किए थे। वह परमप्रतापी क्षत्रिय शक्ति के मद मे मतवाला हो गया था। अनेक नगरों को जीतकर उसने अपने साम्राज्य का विस्तार बहुत अधिक कर लिया था और अब सुखपूर्वक शासन कर रहा था।  एक समय सहस्त्रार्जुन वन मे शिकार करता थक गया तो पास ही महर्षि जमदग्नि के आश्रम मे उसने शरण ली। महर्षि ने राजा, उसके मंत्रियों, अनुचरों, अंगरक्षकों तथा सेना का कामधेनु गाय के प्रताप से खूब स्वागत-सत्कार किया। अर्जुन ने इस गाय को देखकर इसे लेना चाहा और अपने सैनिकों को गाय छीन लेने का आदेश दिया। महर्षि तथा उनकी पत्नी के अत्यधिक आग्रह के बाद भी अर्जुन का अहंकार कम ना हुआ और वह गाय लेकर चल दिया। भगवान परशुराम उस समय आश्रम पर नहीं थे। जब वे आए और उन्हें पता चला तो सहस्त्रार्जुन पर बहुत अधिक क्रोध आया और उन्होनें उसी समय सहस्त्रार्जुन की राजधानी माहिष्मती पर धावा बोल दिया। माहिष्मती के...

भगवान राम के 108 नाम। रोमांच की दुनिया। हिंदू धर्म। (108 names of Bhagwan Ram)| Romanch Ki Duniya | Hindu Dharma

भगवान राम के 108 नाम पद्मपुराण के उत्तरखंड मे भगवान शिव ने माता पार्वती को भगवान राम के 108 नाम बताए। उनके सभी नाम अर्थ सहित दिए जा रहे हैं। 1. श्रीराम- जिनमें योगीजन रमण करते हैं, ऐसे सच्चिदानंदघनस्वरूप श्री राम अथवा सीता-सहित राम। 2. रामचंद्र- चंद्रमा के समान आनंददायी एवं मनोहर राम। 3. रामभद्र- कल्याणमय राम 4. शाश्वत- सनातन भगवान। 5. राजीवलोचन- कमलसमान नेत्रों वाले  6. श्रीमान राजेंद्र- श्री सम्पन्न राजाओं के राजा, चक्रवर्ती सम्राट 7. रघुपुङ्गव- रघुकुल मे सर्वश्रेष्ठ 8. जानकीवल्लभ- जनककिशोरी सीता के प्रियतम 9. जैत्र- विजयशील 10. जितामित्र- शत्रुओं को जीतने वाले 11. जनार्दन- सम्पूर्ण मनुष्योंद्वारा याचना करने योग्य 12. विश्वामित्रप्रिय- विश्वामित्र के प्रियतम 13. दांत- जितेन्द्रिय 14. शरण्यत्राणतत्पर- शरणागतों की रक्षा मे संलग्न 15. बालिप्रमथन- बालि वानर को मारने वाला 16. वाग्मी- अच्छे वक्ता 17. सत्यवाक- सत्यवादी 18. सत्यविक्रम- सत्य पराक्रमी 19. सत्यव्रत- सत्य का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाला 20. व्रतफल- सम्पूर्ण व्रतों के प्राप्त होने योग्य फलस्वरूप 21. सदा हनुमदाश्रय- सदैव हनुमान ...

भगवान विष्णु के दस अवतार | रोमांच की दुनिया । {ten avatar(incarnation) of Bhagwan Vishnu} Mythology | Romanch Ki Duniya |

भगवान विष्णु के दस अवतार पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के कुल दस अवतार हैं जिन्हें वे समय-समय पर दुष्टों के विनाश तथा सत्पुरुषों की रक्षा के लिए लेते हैं। स्वयं भगवान ने गीता के चौथे अध्याय के आठवें श्लोक मे कहा है- परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्क्रताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥  सत्पुरुषों की रक्षा के लिए तथा दुष्टों के विनाश के लिए, धर्म की स्थापना के लिए मै युग-युग मे अवतार लेता हूं। पुराणों मे भगवान के अवतारों का जो क्रम दिया गया है उसे हम यहां दे रहे हैं। 1. मत्स्य अवतार 2. कूर्म अवतार 3. वराह अवतार 4. नरसिंह अवतार 5. वामन अवतार 6. परशुराम अवतार 7. राम अवतार 8. कृष्ण अवतार 9. बुद्ध अवतार 10. कल्कि अवतार सभी अवतारों की पौराणिक कथाएं 1. मत्स्य अवतार प्रलय काल के समय भगवान विष्णु एक मत्स्य का रूप रखकर वैवस्वत मनु के पास गए और भगवान के कहे अनुसार मनु सभी जीवों के एक‌‌‌‌-एक जोड़े को लेकर एक बड़ी नाव पर तब तक रहे जब तक प्रलयकाल समाप्त नहीं हो गया। 2. कूर्म अवतार समुद्र मंथन के समय जब मंदराचल पर्वत को क्षीरसागर मे उतारा गया तब वह डूबने लगा। उसे साधने के लिए भगवा...

भगवान परशुराम का जन्म| रोमांच की दुनिया। पौराणिक कथा। हिंदू धर्म। (Birth of Bhagwan Parashuram)| Romanch Ki Duniya | Mythology | Hindu Dharma

भगवान परशुराम की जन्म पुरुरवा और उर्वशी के पुत्रों के वंश मे कुशिक-वंशीय महाराजा गाधि हुए जिनकी पुत्री सत्यवती महर्षि ऋचीक को पसंद आ गई और उन्होनेंं उसका विवाह कराने के लिए गाधि से कहा। महाराजा गाधि महर्षि ऋचीक से विवाह नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होनें महर्षि से ऐसे एक हज़ार घोड़ों को लाने की शर्त रख दी जो पूरी तरह से श्वेत हों किंतु उनके एक-एक कान श्याम हों। महर्षि ऋचीक वरुण से एक हज़ार ऐसे ही घोड़े ले आए और तब महाराजा गाधि ने अपनी पुत्री का विवाह महर्षि से कर दिया। काफी समय बाद सत्यवती और उसकी मां दोनों ने पुत्र चाहा जिसके लिए महर्षि ऋचीक ने अलग-अलग मंत्रों से दोनों के लिए चरु पकाया और स्नान करने चले गए। सत्यवती की मां ने यह सोचकर कि ऋचीक ने अपनी पत्नी के लिए अधिक उत्तम मंत्र उपयोग किया होगा, सत्यवती का चरु ग्रहण कर गई और सत्यवती ने अपनी मां का चरु ग्रहण कर लिया। जब महर्षि वापस आए और उन्हें पता चला कि उनकी पत्नी ने वह चरु पी लिया जो उनकी सास को पीना चाहिए था तो वे बहुत दुखी हुए। कारण यह था कि महर्षि ऋचीक ब्राह्मण थे अतः उनका पुत्र ब्राह्मण होना चाहिए जो शांत, सत्कर्म करने वाला होना चाहि...

मत्स्य अवतार की कथा (Story of Matsya Avatar) Mythology

मत्स्य अवतार की कथा अग्निपुराण के द्वितीय अध्याय मे वर्णित कथा के अनुसार एक समय वैवस्वत मनु कृतमाला नदी मे जल से पितरों को तर्पण कर रहे थे कि उसी समय उनके हाथ मे एक छोटी सी मछली(मत्स्य) आ गई। राजा ने उसे वापस नदी मे फेंक देने का विचार किया कि मछली बोल पड़ी कि हे महराज! मुझे जल मे न फेंकिए क्योंकि मुझे यहां के ग्राह आदि जलीय जंतुओं से भय है। राजा ने उसके ऊपर दया करके उसे कलश मे डाल लिया किंतु कलश मे पड़ते ही उसका आकार कलश से भी बड़ा होने लगा। उसने राजा से किसी बड़े पात्र मे डालने की विनती की तो राजा ने उसे एक नांंद में डाल दिया। कुछ समय पश्चात मत्स्य का आकार नांद से भी बड़ा होने लगा तो उसने पुनः विनती की तो राजा ने उसे सरोवर मे डाल दिया किंतु वहां भी उसका आकार बढ़ गया तो राजा ने उसे समुद्र मे डाल दिया। इतने समय मे मनु यह जान चुके थे कि यह कोई साधारण मत्स्य नहीं है वरन कोई अलौकिक चीज है। जब मत्स्य को समुद्र मे डाला गया तो वह एक लाख योजन बड़ा हो गया तब राजा ने उसके हाथ जोड़े और बोले कि निश्चय ही आप भगवान नारायण हैं और अपनी लीला कर रहें हैं। मत्स्यरूपी भगवान ने उत्तर दिया कि हे राजन मैंने दुष्टों ...

राम रामेति रामेति रमे श्लोक (Ram Rameti Rameti Rame) Shlok

राम रामेति रामेति रमे श्लोक भगवान शंकर और भगवान नारायण दोनों ही एक दूसरे को सदैव पूजते रहते हैं और इसी तरह शैव और वैष्णव पंथ एक दूसरे के लिए सदैव पूरक रहे हैं। एक समय भगवान शंकर ने माता पार्वती को विष्णु सहस्त्रनाम जप का सुझाव दिया। देवी आदिभवानी माता पार्वती ने उसी दिन से विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ प्रारम्भ कर दिया। महादेव इस बात से अत्यंत प्रसन्न रहने लगे। एक दिन भगवान शिव ने माता को भोजन साथ करने का आमंत्रण दिया किंतु माता ने कहा कि उनको अभी विष्णु सहस्त्रनाम का जप करना है। इस पर देवाधिदेव बहुत प्रसन्न हुए किंतु उस समय उनको अत्यंत भूख लगी थी इसलिए उन्होने कहा- पार्वती! तुम धन्य हो, पुण्यात्मा हो क्योंकि भगवान विष्णु मे तुम्हारी भक्ति है किंतु मै तो भगवान राम का नाम लेकर ही विष्णु सहस्त्रनाम का फल प्राप्त कर लेता हूं अतः तुम भी अभी भगवान राम का नाम लो। तब भगवान शिव ने उन्हें राम मंत्र बताया- राम रामेति रामेति रमे रामे मनो रमे। सहस्त्रनाम तततुल्यं राम नाम वरानने॥ तब देवी माता पार्वती ने इस मंत्र का जप किया और फिर माता ने देवाधिदेव के साथ भोजन किया। भोजन करने के पश्चात माता पार्वती ने उत...

विलासिता से दूर: प्रेरणादायक श्लोक | रोमांच । away from lust | (Inspiring Shloks) Mythology | the romanch

किं विद्यया किं तपसा किं त्यागेन नयेन वा।  किं विविक्तेन मनसा स्त्रीभिर्यस्य मनो हृतम्॥ जिसका मन स्त्रियों ने हर लिया उसे अपनी विद्या, तपस्या, त्याग, नीति तथा विवेकशील चित्त से क्या लाभ हुआ।  what did he gain from his knowledge, austerity, sacrifice, policy and rational mind whose mind is lost by women. पद्म पुराण के पाताल खंड के वैसाख‌‌‌-महात्म्य प्रसंग मे राजा महीरथ की कथा मे यह श्लोक वर्णित है। कथा क्या है पहले यह जान लेते हैं। बहुत समय पहले की बात है महीरथ नाम के एक बड़े राजा थे। एक बड़े सपन्न राज्य के राजा होने पर भी राजा अपने कर्तव्यों की ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते थे। उनके राज्य का सारा कार्य उनके मंत्री के हाथों मे था। धर्म और अर्थ दोनों से दूर राजा कामिनियों की क्रीड़ा मे लगा रहता था। इसी तरह उसने एक लम्बा समय बिता दिया। राजा के एक विद्वान पुरोहित थे नाम था कश्यप। जब उन्होने देखा कि राजा कर्तव्यच्युत होकर राजपाट छोड़कर केवल विलास की जिंदगी जी रहा है, तब इस बात से दुखी होकर वे राजा के पास पहुंचे और बोले कि हे राजन आपके राज्य मे अब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र कोई भी...

सभी ज्योतिर्लिंगो की कथा (बारह ज्योतिर्लिंग) Twelve Jyotirlingam

ज्योतिर्लिंग अधर्म व बुराई के संंहारक, भक्तों के प्रिय, त्रिपुरारी, शम्भू, देवेश्वर, महादेव भगवान श्री शिवशंकर भोलेनाथ इस सृष्टि के सम्पूर्ण सनातन स्वामी हैं। जिनके नाम से कायर व्यक्ति भी बलवान हो जाता है, भक्त प्रेम मे डूब जाता है, दुष्ट कांपने लगते हैं, जो किसी से द्वेष नहीं करते, सभी पंथों के चराचर स्वामी, सर्वप्रिय भगवान महादेव के असंख्य मंदिर इस जगत मे स्थापित हैं। हर गांव, शहर कस्बे आदि मे जिनकी सर्वत्र पूजा होती है आज हम उनके प्रमुख बारह मंदिरों की चर्चा करेंगे। बचपन से ही हम 'ज्योतिर्लिंग' शब्द से परिचित होते रहते हैं। भगवान शिव के असंख्य मंदिरों, अनंत शिवलिंगों मे ज्योतिर्लिंगों का बहुत अधिक महत्व है। ज्योतिर्लिंग संख्या मे बारह हैं जो भारत के अलग-अलग हिस्सों मे स्थित हैं। ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति एक समय जब भगवान नारायण और भगवान ब्रह्मा बड़ा कौन है इस बात पर विवाद कर बैठे तब भगवान शिव ने एक अनादि-अनंत शिवलिंग उनके सामने रख दिया और भगवान नारायण और भगवान ब्रह्मा से क्रमशः शिवलिंग का अंत एवं आदि खोजने के लिए कहा। जो भी पहले लौट के आएगा वही बड़ा होगा। दोनों लोग अपनी दिशा मे...

घुश्मेश्वर शिवलिंग की कथा (Story of Ghrishneshwar Shivlingam) Mythology

घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग  महाराष्ट्र के दौलताबाद से कुछ दूरी पर स्थित वेरुलगांव मे भगवान भोलेनाथ का अंतिम ज्योतिर्लिंग स्थित है। सभी ज्योतिर्लिंगों की कथा शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता से ली गई है। घुश्मेश्वर शिवलिंग की कथा दक्षिण मे देवगिरि पर्वत के निकट भरद्वाज वंश मे सुधर्मा नामक ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण रहते थे। वे अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहते थे। बाकी सभी सुख थे किंतु सुदेहा के कोई पुत्र नहीं था। जब बहुत समय तक सुदेहा को पुत्र प्राप्त नही हुआ तो उसने सुधर्मा से अपनी बहन घुश्मा से विवाह करने का आग्रह किया। प्रारम्भ मे तो सुधर्मा ने यह कहकर इंकार कर दिया कि दो बहनों का प्रेम बाद मे जलन मे बदल जाएगा किंतु सुदेहा के बार बार कहने पर वे विवाह के लिए तैयार हो गए। घुश्मा भगवान शिव की अनन्य सेविका थी। विवाह के पश्चात उसने सुधर्मा और बड़ी बहन सुदेहा की खूब सेवा की, दासी की तरह रही। प्रतिदिन वह एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाती और उनकी पूजा करती। समय बीतता गया। घुश्मा को पुत्र हुआ और उसके बाद घुश्मा का मान बढ़ा। इसके साथ ही सुदेहा के मन मे डाह उत्पन्न हुआ।  बचपन बीतने पर पुत्र का विवाह हुआ और...

रामेश्वरम शिवलिंग की कथा (Story of Rameshwaram Shivlingam) Mythology

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग भारत के दक्षिणी छोर पर समुद्र किनारे बसा श्रीरामनाथस्वामी ज्योतिर्लिंग सभी ज्योतिर्लिंगों मे एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।  सभी ज्योतिर्लिंगों की कथा शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता से ली गई है। रामेश्वरम शिवलिंग की कथा लंका पर आक्रमण करने हेतु जब भगवान श्रीराम समुद्र पर पुल बांधने का कार्य करने जा रहे थे तब उन्होने भगवान शिव के पार्थिव लिंग की स्थापना करके अराधना की। श्रीराम ने कहा कि हे महेश्वर रावण आपका महान भक्त है इसलिए मुझे उसको परास्त करने के लिए आपकी सहायता की आवश्यकता है। इस कठिन कार्य को करने मे मेरी सहायता करें। ऐसा कहकर भगवान राम ने शिव जी की पूजा अर्चना की जिससे प्रसन्न होकर भगवान नीलकंठ वहां प्रकट हुए और उन्होनें कहा कि हे राम! महराज! तुम्हारी जय हो। तब भगवान महादेव उस लिंग मे सदैव के लिए प्रवेश कर गए। जिसे श्री रामनाथस्वामी ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है।

नागेश्वर शिवलिंग की कथा (Story of Nageshwar Shivlingam) Mythology

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग गुजरात के द्वारका से 17 किलोमीटर दूर बसा शिवजी यह मंदिर ज्योतिर्लिंगों मे से एक है। सभी ज्योतिर्लिंगों की कथा शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता से ली गई है। नागेश्वर शिवलिंग की कथा एक समय दारुका नाम की एक राक्षसी थी जो देवी पार्वती की अनन्य भक्त थी। उसने वरदान प्राप्त किया था कि वह जहां-जहां जाएगी वहां सोलह योजन विस्तार का वन उसके साथ जाएगा। वह उसी वन मे अपने पति दारुक के साथ रहती थी। दारुक पापी और दुराचारी था जो सदैव लोगों को तंग किया करता था। ऋषि-मुनियों के यज्ञ आदि मे विघ्न डाला करता था। उससे तंग होकर सभी महर्षि और्व की शरण में गए। महर्षि और्व ने दारुक तथा उसके लोगों को श्राप दिया कि ये राक्षस यदि पृथ्वी पर प्राणियों की हिंसा या यज्ञों का विध्वंस करेंगे तो उसी समय अपने प्राणों से हाथ धो बैठेंगे। ऐसे श्राप से देवताओं को बड़ा लाभ हुआ और उन्होनें राक्षसों पर आक्रमण कर दिया। राक्षस यदि लड़ाई करते तो श्राप के कारण जीवन समाप्त होता और यदि न करते तो देवताओं के हाथों मारे जाते। ऐसे समय मे दारुका ने एक मार्ग निकाला। दारुका जहां जहां-जाती, वहां-वहां वन उसके साथ जाता। इसीलिए वह स...

बैद्यनाथ शिवलिंग की कथा (Story of Baidyanath Shivlingam) Mythology

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग झारखंड के देवगढ़ मे यह मंदिर स्थित है। बारह ज्योतिर्लिंगों मे यह नौवें स्थान पर आता है। सभी ज्योतिर्लिंगों की कथा शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता से ली गई है। बैद्यनाथ शिवलिंग की कथा बहुत समय पहले लंका का राजा रावण एक भीषण तपस्या कर रहा था। महान शिवभक्त राक्षस अपने एक-एक सिर चढ़ा रहा था। जब उसने अपने नौ सिर काट दिए और दसवां सिर काटने वाला ही था कि भगवान शिव वहां प्रकट हुए और प्रसन्न होकर वरदान मांगने को बोले।  एक क्षण मे रावण के सभी सिर पहले जैसे स्वस्थ हो गए। उसने भगवान से लंका पधारने का अनुरोध किया। अंतर्यामी देवेश्वर मुस्कुराए और स्वयं एक लिंग के रूप मे आ गए किंतु एक शर्त रख गए कि जिस प्रथम स्थान पर उन्हे रख दिया जाएगा वहीं वे स्थापित हो जाएंगे। रावण उस लिंग को लेकर जा रहा था कि शिवजी के खेल से उसे लघुशंका की तीव्र तलब लगी। परम पराक्रमी रावण लघुशंका की तलब को रोक न सका और एक ग्वाले को लिंग थमाकर मूत्र-त्याग हेतु गया। एक क्षण मे ग्वाला थक गया और उसने शिवलिंग को नीचे जमीन पर रख दिया। नीचे रखते ही शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया जिसे रावण टस से मस ना कर सका और शिव जी से...

त्र्यम्बकेश्वर शिवलिंग की कथा (Story of Trimbakeshwar Shivlingam) Mythology

त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग दक्षिण गंगा गोदावरी के उद्गम स्थल पर नासिक मे स्थापित भगवान शिव का आंंठवा ज्योतिर्लिंग त्र्यम्बकेश्वर  है। सभी ज्योतिर्लिंगों की कथा शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता से ली गई है। त्र्यम्बकेश्वर शिवलिंग की कथा बहुत समय पहले की बात है जब एक बार पृथ्वी पर भीषण अनावृष्टि हुई। वर्षों तक जल के बिना रहने से धरती सूख गई। तब महर्षि गौतम ने वरुण देव की तपस्या करके एक दिव्य कुंड प्राप्त किया जिसका जल कभी समाप्त नही होता था। कुंड की चर्चा फैली तो अन्य जगहों के ऋषि-मुनि अपने परिवार सहित आकर वहीं बस गए। पशु-पक्षी, जीव-जंतु आकर बसने लगे। लोगों ने आस-पास खेती भी शुरू हो गई। महर्षि गौतम और उनकी पत्नी परमपवित्र देवी अहिल्या कभी किसी को भी जल के लिए मना नहीं करते थे किंतु तब भी कुछ अन्य ऋषियों की पत्नियां रुष्ट हो गईं और उन सभी अपने-अपने स्वामियों से गौतम ऋषि को दंड देने की बात कही।  सभी ऋषि अपनी-अपनी पत्नियों के कहने मे आकर भगवान गणेश की अराधना करने लगे और उन्हे प्रसन्न करने मे सफल हुए। उन सभी ने भगवान से गौतम ऋषि को दंड देने की बात कही जिस पर गणेश जी ने उन्हे बहुत स...

केदारनाथ शिवलिंग की कथा(Story of Kedarnath Shivlingam) Mythology

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले मे हिमालय की गोद मे स्थित केदारनाथ धाम पांचवा ज्योतिर्लिंग तथा छोटा चार धाम मे से एक धाम भी है। सभी ज्योतिर्लिंगों की कथा शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता से ली गई है। केदारनाथ शिवलिंग की कथा भगवान शिव के पांचवे ज्योतिर्लिंग का नाम केदारनाथ है जिसकी पौराणिक कथा दी जा रही है। भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण बदरिकाधाम(बद्रीनाथ) मे रहकर तपस्या किया करते थे। एक बार उन्होने एक पार्थिवशिवलिंग बनाया और उसकी अराधना करने लगे। उन्होने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे शिवलिंग मे विराजकर उनकी प्रार्थना स्वीकार करें।  उनकी प्रार्थना पर भगवान शिव उस केदारतीर्थ मे प्रकट हुए और वहीं स्थित हो गए। भगवान के इस स्वरूप का नाम केदारनाथ हुआ।

भीमशंकर शिवलिंग की कथा (Story of Bheemshankar Shivlingam) Mythology

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग सह्याद्रि पहाड़ियों के पास पुणे से 110 किलोमीटर दूर छठे ज्योतिर्लिंग भीमशंंकर का मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि पास से बहती भीमा नदी का उद्गम इसी मंदिर से होता है।   सभी ज्योतिर्लिंगों की कथा शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता से ली गई है। भीमशंकर शिवलिंग की कथा भगवान शिव का छठा ज्योतिर्लिंग भीमशंकर है। बात तब की है जब त्रेता मे भगवान राम का जन्म हुआ था। उस समय कर्कट और पुष्कसी नाम के एक राक्षस दम्पति ने महर्षि अगस्त्य के शिष्य महान रामभक्त सुतीक्ष्ण को आहार बनाने के उद्देश्य से यात्रा की। जैसे ही वे दोनों महान ऋषिभक्त के सामने गए, सुतीक्ष्ण ने उन दोनों ने अपने तपबल से भस्म कर दिया।  इस दम्पति की कर्कटी नाम की एक कन्या थी जिसका विवाह विराध नाम के एक राक्षस के साथ हुआ था। विराध को भगवान राम ने मार दिया जिसके बाद कर्कटी सह्य पर्वत पर अकेली रहने लगी। एक दिन वहां रावण का छोटा भाई कुम्भकर्ण आया और अकेली स्त्री देखकर उसने कर्कटी का बलात्कार किया और वापस लंका लौट गया। कुम्भकर्ण का वीर्य कर्कटी के गर्भ मे पहुंच गया जिससे उसे एक संतान प्राप्त हुई जिसका नाम भीम पड़ा। दानव भीम...

ओंकारेश्वर महादेव की कथा (Story of Omkareshwar Shivlingam) Mythology

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश के खंडवा जिले मे नर्मदा के समीप स्थापित परमपवित्र ओंकारेश्वर-ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का चौथा ज्योतिर्लिंग है। सभी ज्योतिर्लिंगों की कथा शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता से ली गई है। ओंकारेश्वर महादेव की कथा भगवान शिव के चौथे ज्योतिर्लिंग का नाम ओंकारेश्वर है। इसके विषय मे एक पौराणिक कथा है। एक समय देवर्षि नारद घूमते-घूमते विंध्य जा पहुंचे जहां विंध्य ने उनका बड़ा सत्कार किया। तरह-तरह के साधनों से सत्कार करने के बाद विंध्य ने गर्व से देवर्षि से कहा कि उनके यहां किसी चीज की कमी नही है। उनके पास सब कुछ है। विंध्य की अभिमान भरी बातें सुनकर देवर्षि लम्बी सांस खींची जैसे किसी बात की कमी देख ली। विंध्य ने उनको देखकर उनसे प्रश्न किया कि ऐसा क्या है जिसे ना पाकर देवर्षि असंतुष्ट हुए। नारद ने उत्तर दिया कि भैया तुम्हारे यहां सब कुछ है किंतु मेरु पर्वत तुमसे ऊंचा है जिसके शिखरों का विभाग देवलोक तक है।  इतना कहकर देवर्षि उसी क्षण वहां से चले गए किंतु विंध्य चिंता मे पड़े रह गए। जब उन्हे और कोई राह ना दिखी तो उन्होने भगवान शिव की तपस्या करने का सोचा और ओंकार ...