विवेकचूड़ामणि शिक्षाप्रद श्लोक (vivekachudamani shlok) Adi Shankara
पुरुषवाद और मायावाद के मध्य अंतर स्पष्ट करने वाले, अद्वैतवाद के प्रवर्तक आदिगुरु शंकराचार्य ने सम्पूर्ण भारत मे घूम-घूमकर जीव तथा ब्रह्म के मध्य के सम्बंध को जन-जन तक पहुंचाया। उनके कार्यों को कई पुस्तकों मे संजोया गया है। उनकी शिक्षाएं उपनिषदों मे भरी पड़ी हैं।ब्रह्म क्या है, वह जीव से कैसे जुड़ा है, शरीर क्या है, इसका क्या महत्व है आदि अनेकों प्रश्नों के उत्तर हेतु वे जगह जगह पर सभाएं करते थे, शास्त्रार्थ होते थे और उन्हीं से उनके विचार फैलते थे।
उनके विचारों को जिन पुस्तकों मे संजोया गया है उन्ही मे से एक है विवेकचूड़ामणि।
विवेकचूड़ामणि लगभग 580 श्लोकों की एक पुस्तक है जिसमे ब्रह्म-शरीर-आत्मा के मध्य सम्बंध व अंतर स्पष्ट है। प्रत्येक श्लोक के जरिए आदिगुरु संसार को बताना चाहते हैं कि ब्रह्म सर्वोच्च है, वही सर्वस्व है, सार्वभौमिक है और बाकी सबकुछ मिथ्या है।
आज हम इस पुस्तक के कुछ श्लोकों को तथा उनके अनुवाद को जानेंगे। इसके आगे हम कुछ और श्लोकों को आगे के आर्टिकल्स मे जानेंगे तो आइये पढ़ते हैं आदिगुरु के गूढ़ अर्थ वाले श्लोकों को-
श्रुतिप्रमाणौकमतेः स्वधर्मनिष्ठा तयैवात्मविशुद्धिरस्य।
विशुद्धबुद्धे परमात्मवेदनं तेनैव संसारसमूलनाश:॥
-श्लोक 148
जो श्रुतियों के लिए पूरी तरह समर्पित है, वह अपने स्वधर्म मे निरंतरता प्राप्त करता है जो अकेले ही उसके मन को विशुद्ध करता है। शुद्ध चित्त का मनुष्य सर्वोच्च आत्म का बोध करता है और इस अकेले से संसार अपने जड़ अर्थात अज्ञानता से नष्ट हो जाता है।
आत्मानात्मविवेकः कर्तव्यो बंधमुक्तये विदुषा।
तेनैवानंदी भवति स्वं विज्ञाय सच्चिदानंदम्॥
-श्लोक 152
अपने बंधन को हटाने के लिए बुद्धिमान व्यक्ति को स्वयं और भिन्न के बीच भेदभाव जानना चाहिए। उस अकेले के द्वारा वह अपने स्वयं के आस्तित्व-ज्ञान-परमानंद के रूप मे स्वयं को जान पाता है और प्रसन्न होता है।
देहोSयमन्नभवनोSन्नमयस्तु कोशश्वान्नेन जीवति विनश्यति तद्विहीनः।
त्वक्चर्ममांसरुधिरास्थिपुरीषराशिर्नायं स्वयं भवितुमर्हति नित्यशुद्धः॥
-श्लोक 154
हमारा यह शरीर भोजन का उत्पाद है तथा ऐसी ही सामग्री से ढका है। यह भोजन पर रहता है और इसके बिना मर जाता है। यह त्वचा, मांस, रक्त, हड्डियों और ऐसी ही गंदी चीजों का द्रव्यमान है और कभी भी शाश्वत रूप से शुद्ध, आत्म-आस्तित्वमान नही हो सकता।
त्वङमासमेदोSस्थिपुरीषराशावहंमतिं मूढ़जनः करोति।
विलक्षणं वेत्ति विचारशीलो निजस्वरूपं परमार्थभूतम्॥
-श्लोक 159
यह मूर्ख व्यक्ति है जो त्वचा, मांस, वसा, हड्डियों और गंदगी के द्रव्यमान से अपनी पहचान बनाता है, जबकि विवेकी मनुष्य स्वयं को जानता है, जो एकमात्र सत्य है, जो शरीर से भिन्न है।
देहोSहमित्येव जड़स्य बुद्धिर्देहे च जीवे विदुषस्त्वहंधीः।
विवेकविज्ञानवतो महात्मनो ब्रह्माहमित्येव मतिः सदात्मनि॥
-श्लोक 160
मूर्ख व्यक्ति सोचता है कि वह शरीर है, पुस्तक से सीखा व्यक्ति शरीर और आत्मा के मिश्रण के रूप मे स्वयंं की पहचान करता है जबकि विवेकवान वास्तविकता का अधिकारी महापुरुष स्वयं को अनंत आत्म के रूप मे देखता है और सोचता है 'मै ही ब्रह्म हूं'।
इस तरह यहां विवेकचूड़ामणि के कुछ श्लोक दिए गए हैं। आगे आने वाले आर्टिकल्स मे इस पुस्तक के अन्य श्लोक भी दिए जायेंगे। यदि आपको यह आर्टिकल पसंद आया है तो नीचे कमेंट करके जरूर बताएं।
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