पश्चाताप की आवश्यकता
बात उस समय की है जब अश्वस्थामा को श्रीकृष्ण अमरत्व का श्राप दे चुके थे और वह दर दर ठोकरें खा रहा था। अपने घृणित कर्मों की स्मृति से उसकी आत्मा विदीर्ण हो रही थी, पग पग की ठोकरें खाकर वह भय व दुःख से विलाप करता भटक रहा था किंतु उसे कहीं भी शांति प्राप्त नहीं हो रही थी।
दुर्बल हृदय ईश्वर से प्रश्न करता है, उसकी शरण खोजता है। अश्वस्थामा को भी ऐसे समय ईश्वर का स्मरण हुआ और अपने पापों की क्षमा याचना के लिए वह द्वारिका जा पहुंचा।
महाभारत के युद्ध हुए छत्तीस वर्ष से अधिक समय बीत चुका था। धर्म की पुनर्स्थापना का महायज्ञ पूर्ण हो चुका था, वह मूल्य चुका दिया गया था जिसे युगों तक याद किया जाएगा। एक सम्पूर्ण पीढ़ी का विनाश हो चुका था। भगवान मधुसूदन की श्रम नगरी द्वारिका के लोगों का विनाश हो चुका था और कुछ यदुवंशी ही बचे थे। राज्य की देख-रेख उस समय उद्धव जी के ही हाथ मे थी और अश्वस्थामा उनसे ही जा मिला।
अत्यंत करुण भाव से बिलखते हुए अश्वस्थामा ने उद्धव के आगे हाथ जोड़कर कहा कि हे महाज्ञानी! हे तेजस्वी महात्मा! हे कृष्णप्रिय! मुझे योगेश्वर से मिलना है। कृपा करके मुझे उनसे मिला दें।
परमतत्वदर्शी उद्धव ने अश्वस्थामा की उस अवस्था का ध्यान से अवलोकन किया। उसकी दारुण दशा को देखा। उसके बहते आंसू उसके प्रायश्चित्त को स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बित कर रहे थे। उस करुण अवस्था मे रुदन करते ब्राह्मण कुमार से वे कैसे कह देते कि धर्म, प्रेम, सत्य और करुणा को फैलाने वाले, तीन लोक के स्वामी लीला पुरुषोत्तम योगेश्वर श्रीकृष्ण अपनी भौतिक देह को त्याग चुके हैं। सदैव अपनी मधुर मुस्कान से लोगों को मोह लेने वाले कान्हा का वह रूप अब केवल हृदय और स्मृतियों मे हैं।
उद्धव ने आचार्य द्रोण के उस पुत्र को किसी माध्यम से रोकना चाहा। अपने हृदय के वेग को सम्भालकर उद्धव ने कहा, "हे ब्राह्मण कुमार! योगेश्वर से आप क्यों मिलना चाह रहे हैं? ऐसा क्या है जो उनसे कहना चाह रहे हैं?"
स्वयं की अश्रुधारा मे स्नान करता अश्वस्थामा वहीं भूमि पर बैठ गया और कहने लगा, "मैने अपने जीवन मे बहुत से अधर्म कर डाले। सदैव दुष्ट दुर्योधन का साथ दिया। लोभ मे आकर बहुत सा दुष्कर्म किया। द्रौपदी के पांचोंं पुत्रों को सोते समय मार दिया। ब्रह्मास्त्र का अनैतिक व अनुचित अनुसंधान किया, उत्तरा के गर्भ पर वार करने का पाप किया जिसका दंड श्रीकृष्ण ने मुझे अमरत्व का श्राप देकर दिया। मै आज वनों मे, कंदराओं में, पिशाचों की भांति घूमता रहता, रेंगता रहता हूं। मेरे इस अशुद्ध शरीर से रक्त, पीप आदि गंदगी बहती रहती है और इस तरह मै अपने पूर्व कर्मों का स्मरण करके रोता रहता हूं किंतु मुझे अभी मेरे एक अपराध का दंड नहीं मिला, मै बस वही लेने आया हूं।"
परमविद्वान उद्धव उसकी मनोदशा पर व्याकुल हो गए। उनके भी नेत्रों से आंसू बहने लगे। महर्षि भरद्वाज जैसे महान ऋषि के पौत्र को इस तरह बिलखते देख उन्होने कहा, "ब्राह्मणकुमार! आपको आपके सभी अपराधों का दंड मिल चुका है। अब ऐसा कौन सा अपराध बचा है जिसके दंड की प्राप्ति हेतु आप आज यहां तक आ गए हैं।"
अपनी भावनाओं पर नियंत्रण की कोई चेष्टा किए बिना आचार्यकुमार ने रोते हुए कहना जारी किया, "मैने बहुत से गलत कार्य किए, अधर्म किया किंतु उन सभी को मै स्वीकार कर चुका हूं किंतु आज योगेश्वर से मिलकर मै उनसे एक रहस्य बतलाना चाहता हूं।"
उद्धव उसे देखते रहे।
"जब मैने युद्ध देख लिया। विनाश देख लिया और स्वयं अधर्म कर लिया तो मैनेंं एक महापाप का विचार किया था। मैंने मन ही मन योगेश्वर की हत्या करने का महापाप विचार किया था और आज उसी को स्वीकार करने आया हूं। मै योगेश्वर से उसी अपराध का दंड प्राप्त करने आया हूं।"
उसकी ये मनोदशा देखकर उद्धव का रुदन स्पष्ट हो गया, करुण हो गया और दोनों आदमी रोते रहे। श्रीकृष्ण के दोनों भक्त एक दूसरे को देखते रहे।
हम सभी के जीवन मे भी ऐसी स्थिति कई बार आती है जब हम नृशंस कार्यों, दुष्कर्मों का विचार कर जाते हैं और पाप के भागीदार बनते हैं। पाप का तात्पर्य किसी दूसरी दुनिया के भाग्य या स्थान से नहींं बल्कि इसी जीवन से है। एक बार बुरे विचार के आने के बाद यदि उसके लिए पश्चाताप नहीं होता तो भविष्य मे पुनः वही सोचने की हिम्मत आ जाती है और हमारा जीवन ऐसे बुरे विचारों और अनेकों बुरे कार्यों के मध्य फंंसकर रह जाता है।
वैचारिक विकास के लिए, आध्यात्मिक उत्थान के लिए, नैतिक बल के लिए विचारों का शुद्ध होना परम आवश्यक है और बुरे विचारों को दूर करने के लिए पश्चाताप करना अनिवार्य है। केवल तभी आत्मा का कल्याण सम्भव है।
जय श्री कृष्ण
पढ़ें श्री कृष्ण का जीवन(महाभारत लीला)
Bahut acha likha hai bhaiya
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