Skip to main content

अन्नीश्वर लिंग की कथा (annishwarlingam shivlingam)

अन्नीश्वर लिंग की कथा

एक समय जब पतिव्रता देवी अनुसुइया ने तपस्या करके देवी गंगा का आवाहन किया और गंगा प्रकट हुई तब देवी अनुसुइया ने उनसे वहां सदैव रहने की प्रार्थना की। 

देवी गंगा ने इस प्रार्थना पर कहा कि यदि अनुसुइया एक साल तक की गई शिवपूजा और प्रतिव्रतधर्म का पुण्य-फल देवी गंगा को दे दे तो वे यहां ठहर जाएंगी और देवताओं और मनुष्यों का सदैव कल्याण करेंगी।

पतिव्रता सती अनुसुइया ने बिना एक क्षण सोचे तुरंत अपना एक साल का तप देवी गंगा को अर्पण कर दिया। अनुसुइया के इस महादान से प्रसन्न होकर शिवजी उसी क्षण अपने पार्थिवलिंग से प्रकट होकर उनके समक्ष आ गए और उन्होने देवी अनुसुइया को वरदान मांगने को कहा।

सती अनुसुइया और उनके पति ने भगवान शिव के उस पंचमुखी रूप को देखकर उसकी बारम्बार वंदना की और वरदान मांगा कि हे देवदेवेश्वर यदि आप और देवी गंगा दोनों प्रसन्न हैं तो आप दोनों इसी तपोवन मे स्थित हों और मनुष्य का कल्याण करें।

इस पर भगवान शिव और देवी गंगा उस स्थान पर रहे जहां वे ऋषिशिरोमणि रहते थें और उस लिंग का नाम अन्नीश्वर हुआ।



Comments

Popular posts from this blog

सोमनाथ लिंग की कथा (story of Somnath Temple) Mythology

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग गुजरात के सौराष्ट्र में वेरावल बंदरगाह, प्रभास क्षेत्र मे स्थित सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों मे प्रथम स्थान पर आता है। ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक उतार-चढ़ाव झेलने वाला यह मंदिर अपने वैभव के लिए सदैव ही विश्वविख्यात रहा है। सभी ज्योतिर्लिंगों की कथा शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता से ली गई है। सोमनाथ लिंग की कथा शिवपुराण की कोटिरुद्रसंंहिता की एक कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष ने अपनी सत्ताइस कन्याओं का विवाह चंद्रदेव से किया थ। चंद्रदेव को उन सत्ताइस मे से रोहिणी ही सर्वाधिक पसंद थी जिससे वे सबसे अधिक प्रेम प्रदर्शित करते थे। दक्ष की अन्य छब्बीस कन्याएं इस बात से दुखी होकर अपने पिता के पास गई और अपनी समस्या बताई। दक्ष ने चंद्रदेव को समझाया कि उन्हे सभी पत्नियों को बराबर प्रेम व सम्मान देना चाहिए। यद्यपि प्रजापति ने चंद्रदेव को समझाया किंतु फिर भी वे रोहिणी के प्रति ही आसक्त रहे और इस बात से रुष्ट होकर प्रजापति ने उन्हे श्राप दिया कि जाओ क्षय रोग से पीड़ित हो जाओ। चंद्र के क्षय होने से समस्त लोकों मे हाहाकर मच गया। सभी देवता, देवराज इंद्र तथा कुछ ऋषिगण भगवान ब्रह्मा ...

पश्चिमी एवं भारतीय संस्कृति में अंतर । Difference between Western and Indian civilization. by the romanch

पश्चिम तथा भारतीय संस्कृति में अंतर पश्चिमी संस्कृति और भारतीय दोनों ही संस्कृतियों ने अच्छाई , बुराई , धर्म , ईश्वर , मोक्ष , मुक्ति , पाप-पुण्य , स्वर्ग आदि के विषय में सदियों से चर्चा की है। हज़ारों दृष्टिकोणों के बाद भी किसी ऐसे सटीक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका है कि परम सत्य कैसा है। क्या है। वस्तुतः हम इतने समय के पश्चात भी भूमि पर ही हैं। ऐसे मे ये जानना आवश्यक है कि हमने दोनों शैलियों के मध्य क्या अंतर पाया ? ईश्वर और भगवान मे अंतर पश्चिमी सभ्यता के अनुसार ईश्वर ने अपना संदेश किसी व्यक्ति के द्वारा भेजा , उसी व्यक्ति ने लोगों को उसके विषय मे बताया। उसने ईश्वर के यश की कहानियां सुनाई और तमाम और बातें बताई किंतु उसमें ईश्वर के विषय मे अधिक पता न चला। भारतीय संस्कृति मे भगवान और ईश्वर दो अलग-अलग अर्थ वाले शब्द हैं। भगवान ऐसे महान व्यक्तियों को कहते हैं जिन्होनें हमारे जैसे ही जन्म लिया , इस धरती पर घूमे , जिनका जीवन हमारे जीवन से अधिक संघर्षपूर्ण रहा किंतु उन्होनें कभी हार नहीं मानी। वे आगे बढ़ते गए और उसके संकल्प , उसकी क्षमताओं को हमने सामान्य मनुष्य से बढ़कर मा...

तपस्वी hindi kahani (story in hindi), short story | रोमांच । The Romanch |

तपस्वी Tapaswi is a short story from Romanch . Irony on blind belief of people. Hindi Kahani, Hindi short Story, inspired by true story. (कहानी)                                             image source   https://www.pinterest.com.au/pin/194640015122122996/ एक बार की बात है एक सनकी आदमी कुतुब मीनार के पास से गुजरा। मीनार की ऊंचाई और आभा को देखकर उसके मन मे उसके ऊपर चढ़ने को किया। जब वह मीनार की सर्वोत्तम ऊंचाई तक जा रहा था, तभी उसे वहां के सुरक्षाकर्मियों ने रोक दिया। सनकी जिद करने लगा किंतु उसे ऊंचाई पर जाने की स्वतंत्रता ना दी गई। हारकर वह बाहर आ गया किंतु उसके मन मे सनक आ गई थी। वह इधर उधर लगा।  एक दिन उसे एक सूने क्षेत्र मे एक वीरान पड़ा मंदिर मिला। वह मंदिर की छत पत्थर के पांच अत्यधिक ऊंचे स्तम्भों पर बनाई गयी थी किंतु समय के साथ वह जर्जर हो गई थी। इस मंदिर से कुछ दूरी पर कुछ गांव बसे हुए थे किंतु वहां से कोई भी यहां पूजा-पाठ करने नही आता था।...